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भारत के महान समाज सुधारक, संविधान निर्माता और समानता के प्रतीक भीमराव रामजी आंबेडकर की जयंती हर वर्ष पूरे देश में बड़े सम्मान और उत्साह के साथ मनाई जाती है। यह दिन न केवल उनके जन्म का उत्सव है, बल्कि उनके द्वारा दिए गए मूल्यों—समानता, न्याय और अधिकारों—को याद करने का भी अवसर है। Bhimrao Ramji Ambedkar ने अपने जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करते हुए समाज में व्याप्त भेदभाव और असमानता के खिलाफ आवाज उठाई और एक समतामूलक समाज की नींव रखी।
Bhimrao Ramji Ambedkar ने भारतीय संविधान का निर्माण कर देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा प्रदान किया, जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार मिले। उनकी सोच और विचार आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं। Bhimrao Ramji Ambedkar Jayanti के अवसर पर लोग उनके आदर्शों को अपनाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लेते हैं।इस लेख में हम Bhimrao Ramji Ambedkar के जीवन, उनके योगदान और Bhimrao Ramji Ambedkar Jayanti के महत्व के बारे में विस्तार से जानेंगे, ताकि हम उनके बताए मार्ग पर चलकर एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकें।
Bhimrao Ramji Ambedkar: मुख्य विवरण तालिका
| विवरण | जानकारी |
| नाम | डॉ. Bhimrao Ramji Ambedkar |
| जन्म तिथि | 14 अप्रैल 1891 |
| स्थान | महू, मध्य प्रदेश |
| मुख्य भूमिका | भारतीय संविधान के निर्माता |
| पुरस्कार | भारत रत्न (1990) |
प्रारंभिक जीवन -Bhimrao Ramji Ambedkar
भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. आंबेडकर नगर) में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार थे और शिक्षा के महत्व को समझते थे। बचपन से ही भीमराव रामजी आंबेडकर को समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत का सामना करना पड़ा, जिससे उनका जीवन काफी कठिन रहा। स्कूल में उन्हें अलग बैठाया जाता था और पानी तक छूने की अनुमति नहीं थी।
इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, आंबेडकर ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वे एक मेधावी छात्र थे और उच्च शिक्षा के लिए उन्हें विदेश जाने का अवसर मिला। उन्होंने Columbia University और London School of Economics से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके प्रारंभिक जीवन के संघर्षों ने ही उन्हें समाज में समानता और न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा दी, जो आगे चलकर उनके महान कार्यों की नींव बनी।
शिक्षा के प्रति अटूट प्रेम
ज्ञान के प्रति Bhimrao Ramji Ambedkar का समर्पण वास्तव में बहुत ही अद्भुत और प्रेरणादायक था। उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध एलफिंस्टन हाई स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसके बाद बड़ौदा के महाराज की सहायता से वे उच्च शिक्षा हेतु विदेश गए। उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में अपनी मास्टर डिग्री प्राप्त की। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उन्होंने डॉक्टर ऑफ साइंस की प्रतिष्ठित उपाधि ली। वे अपनी पीढ़ी के सबसे अधिक शिक्षित और विद्वान भारतीय नागरिकों में से एक थे। किताबों के प्रति उनका प्रेम इतना अधिक था कि उनका अपना निजी पुस्तकालय था। हालांकि विदेश में पढ़ाई करना उस समय एक बहुत बड़ी चुनौती मानी जाती थी। उन्होंने अपनी मेहनत से साबित किया कि शिक्षा ही एकमात्र महान अस्त्र है। फलस्वरूप उन्हें दुनिया भर के विद्वानों ने एक महान अर्थशास्त्री के रूप में स्वीकारा।
सामाजिक भेदभाव का सामना -Bhimrao Ramji Ambedkar
भारत लौटने के बाद Bhimrao Ramji Ambedkar को फिर से भेदभाव का सामना करना पड़ा। उच्च शिक्षित होने के बावजूद उन्हें कार्यालयों में उचित सम्मान नहीं मिलता था। लोग उन्हें छूने से बचते थे और अक्सर उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे। इन घटनाओं ने उनके हृदय में सामाजिक परिवर्तन की एक गहरी ज्वाला सुलगा दी। उन्होंने महसूस किया कि केवल कानून बदलने से समाज की सोच नहीं बदलेगी। इसके लिए उन्होंने दलितों को संगठित करने और जागरूक करने का निश्चय किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से छुआछूत जैसी कुरीतियों का पुरजोर विरोध करना शुरू किया। उनके लिए आत्म-सम्मान किसी भी अन्य भौतिक सुख से कहीं अधिक बढ़कर था। समाज के निचले तबके को न्याय दिलाने हेतु उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया। वास्तव में वे एक ऐसे समाज का सपना देखते थे जो पूरी तरह निष्पक्ष हो। Bhimrao Ramji Ambedkar ने हर स्तर पर असमानता के खिलाफ जंग छेड़ दी थी।
बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना
दलितों के उत्थान के लिए Bhimrao Ramji Ambedkar ने एक विशेष संगठन की नींव रखी। वर्ष 1924 में उन्होंने बॉम्बे में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का गठन सफलतापूर्वक किया था। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य अछूतों की शिक्षा और संस्कृति को बढ़ावा देना था। उन्होंने नारा दिया कि “शिक्षित बनो, संगठित रहो और निरंतर संघर्ष करते रहो”। इस सभा के माध्यम से उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए स्कूल और छात्रावास खुलवाए। पुस्तकालयों की स्थापना करके उन्होंने लोगों को पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने दलितों की समस्याओं को सरकार के सामने मजबूती से रखा। समाज के वंचित वर्गों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना बहुत आवश्यक था। इस संगठन ने हजारों लोगों के जीवन में नई आशा की किरण जगाई। फलस्वरूप लोग अपने मानवीय अधिकारों की मांग करने के लिए सड़कों पर उतरे। Bhimrao Ramji Ambedkar ने समाज को एक नई संगठित शक्ति प्रदान की।
महाड़ सत्याग्रह का महत्व -Bhimrao Ramji Ambedkar
पानी जैसे मौलिक अधिकार के लिए Bhimrao Ramji Ambedkar ने ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह किया। वर्ष 1927 में उन्होंने चवदार तालाब से पानी पीकर सामाजिक बेड़ियाँ तोड़ दी थीं। उस समय दलितों को सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने की मनाही होती थी। उन्होंने हजारों समर्थकों के साथ इस अन्यायपूर्ण प्रथा को सबके सामने चुनौती दी। यह केवल पानी की लड़ाई नहीं बल्कि मानवीय गरिमा का बड़ा सवाल था। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रकृति के संसाधनों पर सबका समान अधिकार होना चाहिए। हालांकि उच्च वर्ग के लोगों ने इस शांतिपूर्ण आंदोलन का कड़ा विरोध किया। इसके बावजूद बाबासाहेब अपने निर्णय पर पूरी तरह अडिग और शांत बने रहे। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान दलितों की दयनीय स्थिति की ओर खींचा। फलस्वरूप यह आंदोलन भारतीय नागरिक अधिकार इतिहास में एक मील का पत्थर बना। Bhimrao Ramji Ambedkar ने इस सत्याग्रह से समाज को हिलाकर रख दिया।
गोलमेज सम्मेलन और दलित अधिकार
लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में Bhimrao Ramji Ambedkar ने प्रभावी ढंग से भाग लिया। उन्होंने वहां अछूतों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की पुरजोर मांग उठाई थी। उनका तर्क था कि बिना राजनीतिक शक्ति के दलितों का उद्धार संभव नहीं है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर किया। हालांकि कई भारतीय नेता उनकी इस मांग से पूरी तरह सहमत नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने विश्व पटल पर अपनी बात बहुत मजबूती से रखी। उनकी विद्वत्ता और तर्कों ने विदेशी प्रतिनिधियों को भी काफी प्रभावित किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अछूतों को भी सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलना बहुत जरूरी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए भी लगातार आवाज उठाई। फलस्वरूप उन्हें दलितों के सबसे बड़े और सच्चे नेता के रूप में मान्यता मिली। Bhimrao Ramji Ambedkar ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।
पुणे पैक्ट का ऐतिहासिक प्रभाव -Bhimrao Ramji Ambedkar
वर्ष 1932 में महात्मा गांधी और Bhimrao Ramji Ambedkar के बीच पुणे पैक्ट हुआ। ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग चुनाव प्रणाली की घोषणा की थी। गांधी जी इसके विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। अंततः समाज की एकता बनाए रखने के लिए दोनों नेताओं में समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाई गई। हालांकि उन्होंने अलग निर्वाचन मंडल की मांग को राष्ट्रहित में छोड़ दिया था।
इसके फलस्वरूप दलितों को मुख्यधारा की राजनीति में भागीदारी का अवसर प्राप्त हुआ। यह समझौता भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला एक बहुत बड़ा मोड़ था। इससे दलित समाज को विधायी निकायों में अपनी बात रखने का अधिकार मिला। Bhimrao Ramji Ambedkar ने इस कठिन समय में बहुत ही सूझबूझ का परिचय दिया। समाज के कमजोर वर्गों के लिए यह एक जीत के समान था।
स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री
आजादी के बाद Bhimrao Ramji Ambedkar को भारत का पहला कानून मंत्री बनाया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी योग्यता को देखते हुए यह पद दिया था। एक मंत्री के रूप में उन्होंने न्याय प्रणाली में बड़े सुधार किए। उन्होंने देश के कानूनों को आधुनिक और अधिक मानवीय बनाने का प्रयास किया। उनका मुख्य उद्देश्य कानून के माध्यम से सामाजिक न्याय की स्थापना करना था। उन्होंने सरकारी नीतियों में समानता के सिद्धांतों को बहुत प्राथमिकता के साथ जोड़ा। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रशासनिक सुधारों के लिए भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। हालांकि वे सत्ता के भूखे नहीं थे बल्कि समाज सेवा करना चाहते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान निष्पक्षता और ईमानदारी की नई मिसाल पेश की। Bhimrao Ramji Ambedkar का योगदान सरकार के कामकाज में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उनके नेतृत्व में भारतीय न्याय व्यवस्था को एक नई ऊँचाई प्राप्त हुई।
संविधान निर्माता के रूप में भूमिका
भारतीय संविधान के निर्माण में Bhimrao Ramji Ambedkar की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्हें संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। उन्होंने दुनिया के विभिन्न संविधानों का बहुत ही गहन और सूक्ष्म अध्ययन किया। उनके मार्गदर्शन में भारत का सबसे बड़ा लिखित संविधान तैयार किया गया था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हों। समाज के पिछड़े वर्गों और महिलाओं के हितों की उन्होंने विशेष रक्षा की। संविधान की प्रस्तावना में उन्होंने स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को जोड़ा। हालांकि उनके सामने विभिन्न विचारधाराओं में सामंजस्य बिठाने की बड़ी चुनौती थी। फलस्वरूप भारत को एक मजबूत और लचीला संवैधानिक ढांचा मिल सका। आज भी हमारा लोकतंत्र उन्हीं के बनाए गए महान नियमों पर टिका है। Bhimrao Ramji Ambedkar को आधुनिक भारत का निर्माता कहना बिल्कुल सही है।
हिंदू कोड बिल और महिला अधिकार -Bhimrao Ramji Ambedkar
महिलाओं के उत्थान के लिए Bhimrao Ramji Ambedkar ने हिंदू कोड बिल पेश किया। वे चाहते थे कि महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का कानूनी हक मिले। उन्होंने तलाक और गोद लेने जैसे अधिकारों पर भी विस्तार से काम किया। समाज का एक रूढ़िवादी वर्ग इस आधुनिक बिल का विरोध कर रहा था। उनका मानना था कि महिलाओं की प्रगति के बिना राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। इसके अतिरिक्त उन्होंने कामगार महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश की वकालत की। उन्होंने हमेशा कहा कि समाज की प्रगति महिलाओं की प्रगति से मापी जाएगी। हालांकि बिल को लेकर संसद में बहुत अधिक विवाद और तीखी बहस हुई। इसके विरोध के कारण उन्होंने अंततः अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनका यह बलिदान महिलाओं के प्रति उनके गहरे सम्मान को दर्शाता है। Bhimrao Ramji Ambedkar ने नारी सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव रखी थी।
मजदूरों के लिए किए गए सुधार
श्रमिकों के अधिकारों के लिए Bhimrao Ramji Ambedkar ने क्रांतिकारी कार्य किए थे। उनके प्रयासों से ही मजदूरों के काम के घंटे 12 से 8 हुए। उन्होंने न्यूनतम मजदूरी और कर्मचारी राज्य बीमा जैसे महत्वपूर्ण नियम लागू किए। मजदूरों को उचित वेतन और कार्यस्थल पर सुरक्षा दिलाना उनका मुख्य लक्ष्य था। इसके अतिरिक्त उन्होंने ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता दिलाने में मदद की। वे मानते थे कि मजदूरों का शोषण किसी भी कीमत पर रुकना चाहिए। उन्होंने भारतीय श्रम कानून के ढांचे को पूरी तरह से आधुनिक बना दिया। फलस्वरूप आज करोड़ों कामगारों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिल रही है। उन्होंने कोयला खदानों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए भी नीतियां बनाईं। Bhimrao Ramji Ambedkar वास्तव में गरीब मजदूरों के सबसे बड़े रक्षक थे। उनके आर्थिक सुधारों ने देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान की।
RBI की स्थापना और आर्थिक विचार
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक की नींव उनके विचारों पर है। Bhimrao Ramji Ambedkar एक उत्कृष्ट अर्थशास्त्री और वित्तीय मामलों के बड़े विशेषज्ञ थे। उनकी पुस्तक ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी’ ने काफी लोकप्रियता हासिल की थी। उन्होंने हिल्टन यंग कमीशन के सामने बैंकिंग व्यवस्था पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उनके शोध और तर्कों के आधार पर ही केंद्रीय बैंक की रूपरेखा बनी। उन्होंने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक तरीके समाज के सामने रखे। इसके अतिरिक्त उन्होंने कृषि और उद्योग के बीच संतुलन पर जोर दिया। उनका मानना था कि आर्थिक आजादी के बिना सामाजिक आजादी अधूरी होती है। उन्होंने देश के संसाधनों के समान वितरण की हमेशा वकालत की थी। Bhimrao Ramji Ambedkar के आर्थिक सिद्धांत आज भी नीति निर्माताओं के लिए उपयोगी हैं। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बड़ा योगदान दिया।
बौद्ध धम्म का मार्ग और परिवर्तन
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में Bhimrao Ramji Ambedkar ने बौद्ध धर्म अपनाया। वे हिंदू धर्म में व्याप्त जातिगत भेदभाव से बहुत अधिक दुखी थे। उन्होंने घोषणा की थी कि वे हिंदू पैदा हुए पर हिंदू मरेंगे नहीं। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। उनके साथ लाखों समर्थकों ने भी इस शांतिप्रिय धर्म को अपनाया था। उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वतंत्रता और समानता का सच्चा प्रतीक माना था। उनका मानना था कि यह धर्म तर्क और करुणा पर आधारित है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 विशेष प्रतिज्ञाएं भी दिलाई थीं। यह धर्मांतरण समाज में मानसिक और आध्यात्मिक क्रांति का एक बड़ा जरिया बना। फलस्वरूप दलितों को एक नई पहचान और गौरवपूर्ण जीवन जीने की राह मिली। Bhimrao Ramji Ambedkar ने आध्यात्मिक शांति को सामाजिक न्याय से जोड़ा।
Bhimrao Ramji Ambedkar जयंती का वैश्विक उत्सव
अंबेडकर जयंती का उत्सव अब केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा। पूरी दुनिया में इसे बड़े गर्व और सम्मान के साथ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस दिन को ‘समानता दिवस’ के रूप में स्वीकारा है। विदेशों में रहने वाले भारतीय इस दिन भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोलंबिया और लंदन की यूनिवर्सिटी में उनके योगदान को याद किया जाता है। लोग उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उनके महान विचारों की चर्चा करते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि संघर्ष से सब कुछ संभव है। इसके अतिरिक्त डिजिटल माध्यमों से उनके भाषणों का व्यापक प्रचार होता है। समाज के हर वर्ग के लोग उनकी जयंती में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। Bhimrao Ramji Ambedkar का कद एक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित है। उनकी जयंती न्याय और लोकतंत्र के प्रति हमारी आस्था को मजबूत करती है।
निष्कर्ष
डॉ. Bhimrao Ramji Ambedkar की विरासत हमें सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों के अधिकारों की रक्षा में लगा दिया। उनके विचार आज भी हर पीड़ित व्यक्ति की ढाल बने हुए हैं। उन्होंने शिक्षा और संघर्ष के माध्यम से समाज को नई दिशा दिखाई। उनके लिखे ग्रंथ आज भी शोधकर्ताओं के लिए ज्ञान का सागर हैं। हमें उनके बताए गए समानता के मार्ग पर चलना चाहिए।
भारत हमेशा उनके महान ऋण के नीचे गर्व से दबा रहेगा। वास्तव में वे एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी विचारधारा हैं। आने वाली पीढ़ियां उनके साहस और बलिदान से निरंतर सीख लेती रहेंगी। Bhimrao Ramji Ambedkar सदा हमारे दिलों और संविधान में जीवित रहेंगे। उनका नाम सुनते ही न्याय और समानता की तस्वीर उभर आती है। समाज के सर्वांगीण विकास के लिए उनके आदर्श अत्यंत आवश्यक हैं।
FAQs
- अंबेडकर जयंती कब और क्यों मनाई जाती है?
यह हर साल 14 अप्रैल को डॉ. Bhimrao Ramji Ambedkar के जन्मदिवस और उनके सामाजिक योगदान के सम्मान में मनाई जाती है। - डॉ. अंबेडकर को ‘संविधान का जनक’ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि वे भारतीय संविधान की प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसके निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई। - Bhimrao Ramji Ambedkar का जन्म कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू (अब डॉ. अंबेडकर नगर) में हुआ था। - समानता दिवस (Equality Day) क्या है?
अंबेडकर जयंती को आधिकारिक तौर पर ‘समानता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है ताकि उनके न्यायपूर्ण समाज के सपने को याद किया जा सके। - डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न कब मिला?
डॉ. Bhimrao Ramji Ambedkar को मरणोपरांत वर्ष 1990 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया था। - उन्होंने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया था?
जातिगत भेदभाव और छुआछूत से मुक्ति पाने व करुणा के मार्ग पर चलने के लिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया। - Bhimrao Ramji Ambedkar द्वारा स्थापित प्रसिद्ध संगठन कौन सा था?
उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए 1924 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की थी। - चवदार तालाब सत्याग्रह क्या था?
यह अछूतों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने का अधिकार दिलाने के लिए किया गया एक ऐतिहासिक आंदोलन था। - उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें कौन सी हैं?
उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ और ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी’ शामिल हैं। - अंबेडकर जयंती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे मनाया जाता है?
संयुक्त राष्ट्र (UN) और विदेशों के कई विश्वविद्यालय इसे मानवाधिकारों और समानता के उत्सव के रूप में मनाते हैं।
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