Who Killed Lord Krishna, who killed lord krishna in hindi, lord krishna death mystery, bhalka tirth history, gandhari curse to krishna, shri krishna dehatyag, jara hunter story
Who Killed Lord Krishna – महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद द्वारका नगरी में धीरे-धीरे अराजकता फैलने लगी थी। पांडवों की विजय के बाद भी धर्म की स्थापना के लिए कई कठोर निर्णय आवश्यक हो गए थे। गांधारी के शाप के कारण यदुवंश का विनाश निश्चित हो चुका था। भगवान श्रीकृष्ण ने इस बात को भलीभांति स्वीकार कर लिया था। वह जानते थे कि उनका धरा पर अवतार का उद्देश्य अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका है।
इसलिए वह प्रभास क्षेत्र के जंगलों में एकांतवास के लिए चले गए। वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे वह विश्राम करने लगे। इसी स्थान पर एक शिकारी की भूल के कारण ऐतिहासिक घटना घटित हुई। वास्तव में यह घटना केवल एक सामान्य दुर्घटना नहीं थी। इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य और पूर्व जन्मों का कर्म फल छिपा हुआ था। इस महान अवतारी पुरुष की देह त्याग की गाथा आज भी हर श्रद्धालु को गहराई से झकझोर देती है।
भगवान कृष्ण को किसने मारा? (Who Killed Lord Krishna and Why)
भगवान श्रीकृष्ण जब प्रभास क्षेत्र के सघन वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान मुद्रा में विश्राम कर रहे थे, तब उनके चरण का निचला भाग एक हिरण के मुख जैसा दिखाई दे रहा था। उसी समय जरा नाम का एक व्याध (शिकारी) वहां शिकार की खोज में आया था। उस शिकारी ने झाड़ियों के पीछे से केवल चमकते हुए चरण को देखा। उसने उसे वास्तव में एक हिरण समझ लिया। बिना अधिक सोचे-समझे शिकारी ने तुरंत अपना बाण चला दिया।
परिणाम स्वरूप वह बाण सीधे श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में जाकर लग गया। जब जरा शिकारी अपने शिकार को उठाने के लिए आगे आया, तो उसने वहां भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को पाया। वह दृश्य देखकर शिकारी अत्यधिक भयभीत हो गया। इसके बाद उसने रोते हुए प्रभु के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ उसे दिलासा दिया और कहा कि यह सब नियति के विधान के अनुसार ही संपन्न हुआ है।
बाली का पुनर्जन्म और जरा शिकारी की कथा
त्रेतायुग के कर्म का फल
भगवान श्रीकृष्ण की यह लीला पूर्व जन्म के कर्म चक्र से सीधे तौर पर जुड़ी हुई थी। त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम ने अवतार लिया था, तब उन्होंने किष्किंधा के राजा बाली को वृक्ष की आड़ से बाण मारा था। उस समय राम जी ने बाली को यह वरदान दिया था कि द्वापर युग में वह अपने इस कर्म का हिसाब बराबर करेंगे। वास्तव में वही राजा बाली द्वापर युग में जरा नामक शिकारी के रूप में पैदा हुआ था।
हालांकि भगवान किसी कर्म के बंधन में नहीं बंधते, फिर भी उन्होंने संसार को कर्मफल का सिद्धांत समझाने के लिए इस लीला को रचा। वास्तव में जरा शिकारी का बाण केवल एक निमित्त मात्र था। इसके अलावा यह घटना यह दर्शाती है कि प्रकृति का नियम सबके लिए समान होता है। भगवान ने स्वयं आगे बढ़कर अपने ही बनाए नियमों का पूरी तरह से पालन किया। इस तरह त्रेतायुग का वह अधूरा कर्मचक्र द्वापर युग में आकर शांतिपूर्वक समाप्त हो गया।
गांधारी का शाप और यदुवंश का अंत
कुरुक्षेत्र युद्ध के समाप्त होने के पश्चात माता गांधारी अपने सौ पुत्रों के विनाश से अत्यंत दुखी और क्रोधित थीं। उन्होंने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को मुख्य उत्तरदायी माना। परिणामस्वरूप गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया कि जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ, ठीक उसी प्रकार उनका यदुवंश भी आपस में लड़कर नष्ट हो जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि श्रीकृष्ण की मृत्यु भी किसी साधारण प्राणी की भांति एक निर्जन वन में होगी।
श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के इस शाप को बहुत ही विनम्रतापूर्वक और हंसते हुए स्वीकार कर लिया। इसके बावजूद उन्होंने यदुवंशियों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे कि यदुवंशी भी अहंकार से भर चुके थे। संक्षेप में कहें तो द्वारका के विनाश और भगवान के देहत्याग का मुख्य कारण यही शाप बना। कालान्तर में प्रभास क्षेत्र में सभी यादवापस में लड़कर समाप्त हो गए। इसके बाद द्वारका नगरी भी समुद्र में डूब गई।
भालका तीर्थ और अंतिम क्षण
जिस स्थान पर जरा शिकारी का बाण भगवान को लगा था, वह स्थान आज गुजरात में भालका तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। बाण लगने के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नश्वर शरीर का त्याग करने का निर्णय लिया। इसके बाद वे सोमनाथ के निकट हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के संगम पर चले गए। इस पवित्र स्थान को देहोत्सर्ग तीर्थ के नाम से जाना जाता है। वास्तव में भगवान ने वहां पहुंचकर अपने वास्तविक वैकुंठ रूप को धारण किया।
इसके साथ ही समस्त देवताओं ने आकाश से उन पर पुष्प वर्षा की। हालांकि उनके भौतिक शरीर छोड़ने से पृथ्वी पर द्वापर युग का अंत हो गया। परिणाम स्वरूप उसी क्षण से पृथ्वी पर कलि युग (कलयुग) का आगमन हुआ। श्रीकृष्ण का यह प्रस्थान केवल एक शरीर का त्याग था, क्योंकि आत्मा तो अमर और अविनाशी है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान आज भी अत्यंत पवित्र और वंदनीय माना जाता है।
निष्कर्ष | Who Killed Lord Krishna
शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण साक्षात परमब्रह्म हैं। उनकी न तो कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत होता है। इसलिए उनकी सामान्य मनुष्यों की तरह ‘मृत्यु’ नहीं हो सकती। उन्होंने केवल अपनी इच्छा से अपनी इस भौतिक लीला को समेटा था। इसके अतिरिक्त भगवद्गीता में उन्होंने स्वयं कहा है कि आत्मा कभी मरती नहीं है और न ही इसे कोई शस्त्र काट सकता है। हालांकि उन्होंने मानव रूप में अवतार लिया था, इसलिए उन्होंने इस लोक के सभी नियमों का पूर्ण सम्मान किया।
इसके साथ ही उन्होंने संसार को यह संदेश दिया कि जो भी इस पृथ्वी पर जन्म लेता है, उसका जाना भी पूरी तरह से निश्चित है। वास्तव में उनका देहत्याग एक अलौकिक घटना थी। इसके बावजूद आज भी करोड़ों भक्तों के हृदय में श्रीकृष्ण अपनी अमर लीलाओं और श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान के रूप में सदैव जीवित हैं। उनका जीवन हमें सदा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।
| होम पेज पर जाने के लिए | यहां क्लिक करें |
FAQs
- भगवान कृष्ण को किसने मारा?
जरा नामक एक शिकारी ने भूल से हिरण समझकर भगवान श्रीकृष्ण के पैर में बाण मारकर उनका वध किया था। - श्रीकृष्ण की मृत्यु के समय उनकी उम्र क्या थी?
देहावसान के समय भगवान श्रीकृष्ण की आयु लगभग 125 वर्ष 8 माह मानी जाती है। - श्रीकृष्ण को बाण कहां लगा था?
भगवान श्रीकृष्ण को जरा शिकारी का बाण उनके बाएं पैर के तलवे में लगा था। - गांधारी ने श्रीकृष्ण को क्या शाप दिया था?
- गांधारी ने कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद श्रीकृष्ण और उनके पूरे यदुवंश के विनाश का शाप दिया था।
- श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद द्वारका का क्या हुआ?
भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के तुरंत बाद पूरी द्वारका नगरी समुद्र जल में जलमग्न हो गई थी। - जरा शिकारी पूर्व जन्म में कौन था?
जरा शिकारी त्रेतायुग में किष्किंधा का राजा बाली था, जिसे श्रीराम ने आड़ से बाण मारा था। - श्रीकृष्ण का देहत्याग किस स्थान पर हुआ था?
गुजरात के सोमनाथ के पास स्थित भालका तीर्थ (प्रभास क्षेत्र) में श्रीकृष्ण का देहत्याग हुआ था। - श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद कलयुग कब शुरू हुआ?
भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग करते ही द्वापर युग समाप्त हुआ और कलयुग का आगमन हुआ। - श्रीकृष्ण के अंतिम संस्कार का क्या रहस्य है?
श्रीकृष्ण का संपूर्ण शरीर अग्नि में लीन हो गया, केवल उनका हृदय (पिंड) सुरक्षित बच गया था। - श्रीकृष्ण का हृदय आज कहां स्थित है?
मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का पवित्र हृदय आज पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर की मूर्ति में स्थित है।
अन्य पढ़ें –
how to remove dandruff home remedies
When Did the Mahabharata Happen? महाभारत कब हुआ था
यह लेख पौराणिक मान्यताओं व धर्मग्रंथों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना है।